कृषि

नागा समाज मूल रूप से एक कृषि-प्रधान समाज है और कृषि राज्य के शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद (Net State Domestic Product – NSDP) में महत्वपूर्ण योगदान देती है। किफिरे जिले की 90% से अधिक आबादी कृषि कार्यों में लगी हुई है। कृषि भूमि संसाधनों का सबसे बड़ा उपयोग करने वाला क्षेत्र है। इसलिए कृषि भूमि की उर्वरता और कृषि उत्पादन जिले के अधिकांश लोगों की आजीविका तथा विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। किफिरे जिले में कृषि क्षेत्र के प्रदर्शन, समस्याओं और संभावनाओं को समझने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं का अध्ययन किया जाता है।

1. कृषि-जलवायु परिस्थितियाँ (Agro-Climatic Conditions)

किफिरे जिले में विभिन्न प्रकार की कृषि-जलवायु परिस्थितियाँ पाई जाती हैं, जो अनेक प्रकार की फसलों के उत्पादन के लिए अनुकूल हैं।

    • जिले में दक्षिण-पूर्वी मानसून का प्रभाव रहता है।

    • औसत वार्षिक वर्षा लगभग 1,500 से 1,800 मिलीमीटर होती है।

    • वर्षा मुख्यतः मई से अक्टूबर तक, लगभग छह महीनों की अवधि में होती है।

    • संभावित वाष्पोत्सर्जन (Potential Evapotranspiration) लगभग 1,219 मिलीमीटर है।

    • नवंबर से अप्रैल तक काफी समय के लिए पानी की कमी रहती है, जिससे खेती प्रभावित होती है।

2. मिट्टी और स्थलाकृति (Soil and Topography)

जिले की मिट्टी का निर्माण मुख्य रूप से तृतीयक काल की बेरेली (Bareli) और दिसांग (Disang) श्रृंखलाओं की चट्टानों से हुआ है। जिला क्षेत्रफल में छोटा होने के बावजूद, यहाँ की स्थलाकृति और जलवायु में काफी विविधता है। इसी कारण जिले में कई प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं। जिले में मिट्टी के दो प्रमुख प्रकार हैं: – जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil):

    • नवीन जलोढ़ मिट्टी (Recent Alluvium – Entisol)।

    • पुरानी जलोढ़ मिट्टी (Old Alluvium – Oxisols और Ultisols)।

    • पर्वतीय घाटी की मिट्टी (Mountain Valley Soil – Entisol)।

– अवशिष्ट मिट्टी (Residual Soil):

    • लैटेराइट मिट्टी (Laterite Soil – Oxisols और Ultisols)।

    • भूरी वन मिट्टी (Brown Forest Soil – Mollisols और Inceptisols)।

    • पॉडज़ोलिक मिट्टी (Podzolic Soil – Spodosols)।

इन विभिन्न प्रकार की मिट्टियों के कारण जिले में अलग-अलग फसलों की खेती की संभावनाएँ मौजूद हैं।

3. कृषि प्रणाली (Agricultural System)

किफिरे जिले में खेती की मुख्य पद्धति पारंपरिक झूम खेती (Jhum Cultivation) है, जिसे स्थानांतरित खेती भी कहा जाता है।

झूम खेती की प्रमुख विशेषताएँ

    • खरीफ मौसम में मिश्रित फसल प्रणाली अपनाई जाती है।

    • झूम के खेतों में मुख्य रूप से मक्का, धान, राजमा की स्थानीय किस्म ‘खोलार’ (Kholar – Phaseolus प्रजाति) और सोयाबीन उगाए जाते हैं।

    • जिले की भूमि अधिकतर पहाड़ी और ढलानदार है। इसलिए बीजों को मिट्टी में डालकर बोया जाता है और मिट्टी तथा पोषक तत्वों के नुकसान से बचने के लिए गहरी जुताई सामान्यतः नहीं की जाती।

    • मक्का का उपयोग मुख्य रूप से घरेलू पशुओं के चारे के रूप में किया जाता है, लेकिन अब इसकी बाजार में बिक्री के लिए भी बड़े पैमाने पर खेती की जा रही है।

    • झूम खेती के चक्र में गाँवों की आबादी, कृषि करने वाले परिवारों की संख्या, मिट्टी के प्रकार और गाँव के नियंत्रण में उपलब्ध भूमि के अनुसार अंतर होता है। इसलिए सभी गाँवों में झूम खेती का चक्र एक समान नहीं है।

सीढ़ीदार धान की खेती (Terrace Rice Cultivation – TRC)

जिले में खेती की दूसरी प्रमुख पद्धति सीढ़ीदार धान की खेती है, जिसे TRC कहा जाता है।

    • यह खेती अपेक्षाकृत कम ढलान वाली पहाड़ियों और निचले क्षेत्रों में की जाती है।

    • पहाड़ी ढलानों पर सीढ़ीनुमा खेत बनाए जाते हैं।

    • इन खेतों में आसपास की धाराओं और जलस्रोतों से सिंचाई का पानी पहुँचाया जाता है।

    • खरीफ मौसम में मुख्य रूप से धान की विभिन्न किस्में उगाई जाती हैं।

    • रबी मौसम में पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं होने के कारण धान की खेती करना कठिन हो जाता है।

4. भूमि उपयोग का स्वरूप (Land Use Pattern)

किफिरे जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्र में से लगभग 57,080 हेक्टेयर भूमि खेती के लिए उपलब्ध है। इसमें परती भूमि तथा कुल फसल क्षेत्र शामिल हैं। कुल फसल क्षेत्र में शुद्ध बोया गया क्षेत्र, दोहरी फसल और मिश्रित फसल के अंतर्गत आने वाली भूमि शामिल है। वर्तमान में लगभग 16,036 हेक्टेयर भूमि कृषि कार्यों में उपयोग की जा रही है। भूमि उपयोग से संबंधित प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

    • रबी मौसम में कृषि गतिविधियाँ सीमित रहती हैं।

    • फसल कटाई के बाद नवंबर की शुरुआत तक खेती की गतिविधियाँ समाप्त हो जाती हैं और भूमि मार्च तक काफी हद तक अनुपयोगी रहती है।

    • जिले में समतल और निचली कृषि भूमि सीमित मात्रा में उपलब्ध है।

    • जुंगकी (Zungki) और त्सुंगाकी (Tsungaki) नदियों के आसपास कुछ निचली भूमि खेती के लिए उपयुक्त है, लेकिन यह बड़े पैमाने पर व्यावसायिक कृषि के लिए पर्याप्त नहीं है।

5. फसल उत्पादन और उत्पादकता (Crop Production and Productivity)

किफिरे जिले की जलवायु और मिट्टी विभिन्न प्रकार की फसलों के उत्पादन के लिए अनुकूल हैं। जिले में लगभग 32 प्रकार की फसलें व्यापक रूप से उगाई जाती हैं। प्रमुख फसलों में शामिल हैं:

    • अनाज: धान, मक्का, विभिन्न प्रकार के बाजरे और जॉब्स टीयर्स।

    • दलहन: विभिन्न प्रकार की दालें और फलियाँ।

    • नकदी फसलें: आलू तथा अन्य बाजार में बेची जाने वाली फसलें।

जिले में बड़े पैमाने पर व्यावसायिक कृषि उत्पादन की संभावनाएँ मौजूद हैं। हालांकि, तेल निकालने की सुविधा उपलब्ध न होने के कारण किसान बड़े पैमाने पर उत्पादन करने से हिचकिचाते हैं।

6. कृषि और संबंधित क्षेत्र (Agriculture and Allied Sectors)

कृषि के साथ-साथ बागवानी और पशुपालन भी किफिरे जिले की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। ये क्षेत्र जिले के शुद्ध घरेलू उत्पाद (Net District Domestic Product) में योगदान देने के साथ-साथ रोजगार के प्रमुख स्रोत भी हैं। हालाँकि, जिले में कृषि गतिविधियाँ अभी भी मुख्य रूप से निर्वाह कृषि (Subsistence Farming) तक सीमित हैं, अर्थात किसान अपनी और अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अधिक खेती करते हैं। व्यावसायिक कृषि को बढ़ावा देने की पर्याप्त संभावनाएँ होने के बावजूद, निम्नलिखित समस्याओं के कारण इसका विकास धीमा है:

    • पर्याप्त विपणन सुविधाओं का अभाव।

    • परिवहन संबंधी समस्याएँ।

    • उत्पादों को बाजार तक पहुँचाने में कठिनाई।

    • बड़े पैमाने पर उत्पादन और बिक्री के लिए आवश्यक सुविधाओं की कमी।

इन समस्याओं का समाधान करके किफिरे जिले में कृषि, बागवानी और पशुपालन के विकास तथा किसानों की आय बढ़ाने की संभावनाओं को मजबूत किया जा सकता है।